बुधवार, 4 नवंबर 2009

मनोज तिवारी के गाने फूहड़ कहाँ ?

`बेबी बीयर पीके नाचे ली छम्मक-छम्मक छम`/`ई लइकी हाई वोल्टेज वाली करंट मारे ली/`कनवा में सोने बाली, जूड़ा में लगा के जालीचाल चलेली मतवाली, बगल वाली जान मारे ली`/`हाथ में लेके पेप्सी कोला ढक ढक ढारतियास्टाइल मारतिया, ईहे मंत्री जी धिया।`
अगर आप भोजपुरी में रूचि रखते हैं तो इन गीतों को जरूर सुना होगा। ये गीत गायक मनोज तिवारी ने गाएँ हैं। उनके व्यक्तित्व के कई उजले पहलू हैं। और यह स्याह पक्ष भी कि उन्होंने भोजपुरी को गाते वक्त कई बार श्लील-अश्लील की सीमा का भेद मिटा दिया है। हो सकता है कि वे यह सब बाजार के प्रभाव में करते हों। सुख भी मिलता अगर वे इस मजबूरी को स्वीकारने का साहस दिखा पाते लेकिन वे जब भोपाल आए और उनसे बातचीत का मौका मिला तो वे इस बात से साफ इंकार कर गए कि उनके गानों में कहीं कोई अश्लीलता भी है! मनोज तिवारी कहते हैं कि ये गाने फूहड़ नहीं `रोमांटिक` हैं। `रोमांस` और `अश्लीलता` में अंतर है, मैं `साफ-सुथरे` गीत गाता हूँ। लोग मुझे `अज्ञानता वश` फूहड़ और अश्लील गीत गाने वाला समझते हैं। उनसे जब पूछा गया कि जब तक आप माथे पर चुनरी बांॅधे रहते हैं तब तक देवी माता के गीत गाते हैं, उसके बाद अपने प्रचलित रंग में क्यों आ जाते हैं? खुद को भोजपुरी के महाकवि भिखारी ठाकुर का शिष्य बताने वाले मनोज का जवाब भी जानिये। वे कहते हैं कि कम से कम माथे पर माता की चुनरी धारण करके मैं `रोमांटिक` गाने नहीं गाता। मैंने जब उनसे पूछा कि भोजपुरी के प्रति इतना ही अनुराग है तो िफर भोजपुरी का पर्याय बन गई शारदा सिन्हा जैसी लोक गायिका को छोड़ बाजार ने दिवाकर दुबे, गुड्डू रंगीला जैसे सस्ते भोजपुरी गायकों को आगे क्यों बढ़ाया? मनोज ने नाम न लेते हुए कहा कि आप जिन लोगों का उल्लेख कर रही हैं वे आज चचिoत है। जो अपनी कोशिशों से लोगों में खड़ा है, उसमें कुछ न कुछ बात तो होगी। शारदा दीदी सम्मानित गायिका हैं पर उनके पास समय नहीं है, वे सर्विस भी करती हैं। जब मैंने एक और सवाल पूछना चाहा तो इस कुशल कलाकार ने तनिक मुस्काते हुए कहा कि `ढेर पोस्टमार्टम मत करिए।´ `ससुरा बड़ा पैसा वाला` िफल्म में नायक की भूमिका निभाने वाले मनोज से जब पूछा गया कि बंग्ला व अन्य भारतीय भाषाओं की भांति भोजपुरी सिनेमा की गरिमा क्यों नहीं है? इस पर उनका उत्तर रहा है कि भोजपुरी में अच्छे निर्माता नहीं हैं। अगर ऐसा है तो आप पहल क्यों नहीं करते? सवाल जरा टेढ़ा था और मनोज का जवाब जरा सच्चा। उन्होंने कहा -अब मैं उस लायक बन रहा हूं कि अच्छी िफल्में बनाऊं।